ग़ज़ल – ना हम रो पा रहे है, ना हम हंस पा रहे है

ना हम रो पा रहे है, ना हम हंस पा रहे है
फिर उसी बेबफ़ा से, ये दिल लगा रहे है

अपने नादाँ दिल को, ये समझा नहीं सकते
वो फिर हमारे दिल में, वही आग लगा रहे है

ये बात अगल़ात की नहीं, इश्क़-ए-अज़ाब की है
रोशन कर इक चराग़ को, हम हवा को बुला रहे है

क्या ख़ुदा का भी डर नही, जो इतना गुमां है उन्हें
हाथों की उन लकीरों को, खुद हाथ से मिटा रहे है

इख़्लास-ए-उल्फ़त में, ये इक़रार किया था मैंने की
साग़र न उठाएंगे, ये कू-ए-मुग़ाँ वाले फिर बुला रहे है

अब और कितनी आह भरे हम, अपने ए’तिबार की
इस इताब में है वो, कि खुद अपना मकां जला रहे है

वो मलाल अपने दिल का, हम मिटा नहीं पा रहे
गाह गाह दर्द-ए-दिल को, अपने दर्द जता रहे है

उनसे इत्तिहाद की कोशिशे, इब्तिदा है आजकल
इब्तिला है तामीर-ए-इश्क़ को वो यूँ छुपा रहे है

क़फ़स-ए-कब्र में हूँ मैं कब से, उस नूर-ए-क़मर की
मर्ग-ए-विसाल की चाह में, खुद का गला दबा रहे है

क़रार नहीं अब इस दिल को, अमल-ओ-क़ौल ये है
की खुद की आरज़ू की मशाल, खुद ही बुझा रहे है

रिंद-ए-बला-नोश हुए हम, इश्क़ की तिश्नगी में “शिवांश”
अहल-ए-शबाब में दुनिया को, मस्ख़रा बन हँसा रहे है

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